पानी-बिजली से शुरू हुआ आंदोलन पहुंचा गोलीकांड तक… एक छात्र की चली गई जान
चांपा। आज की Gen Z पीढ़ी अपने अधिकारों और व्यवस्था के सवालों को लेकर आवाज उठाती है, लेकिन चांपा के इतिहास में युवाओं के संघर्ष की कहानी कोई नई नहीं है। करीब 43 वर्ष पहले सितंबर 1983 में चांपा में छात्रों और युवाओं ने मूलभूत सुविधाओं को लेकर ऐसा आंदोलन खड़ा किया था, जिसकी गूंज लंबे समय तक शहर में सुनाई देती रही।
23 सितंबर 1983 को शुरू हुआ यह आंदोलन अगले ही दिन 24 सितंबर को उस समय बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया, जब पुलिस ने छात्रों की गिरफ्तारी के साथ लाठीचार्ज किया और बाद में गोलीबारी की घटना सामने आई।
आखिर किस बात पर भड़के थे छात्र?
बताया जाता है कि उस दौर में शहर में पानी, बिजली और सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर नागरिकों में नाराजगी थी। छात्रों और युवाओं ने प्रशासन के सामने अपनी मांगें रखने का फैसला किया।
प्रशासन की ओर से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद आंदोलन तेज होता गया। प्रदर्शनकारियों ने तत्कालीन मुख्य नगरपालिका अधिकारी राजीव लोचन पाण्डेय सहित अधिकारियों के खिलाफ विरोध जताया। लेख के अनुसार अधिकारियों को घरों से निकालकर चप्पल-जूतों की माला पहनाने और मुंह पर कालिख पोतने जैसी घटनाएं भी हुईं।
गिरफ्तारी के बाद बिगड़े हालात
आंदोलन से जुड़े युवाओं में रामचरण सोनी, रमाकांत सोनी, सुनील सेठी, इब्राहिम मेमन, अनुपम श्रीवास्तव, मुकेश कुमार, शशि शुक्ला, गणेश यादव, शशिकांत पाण्डेय, रमेश्वर गुप्ता, कन्हैया… समेत अन्य नामों का उल्लेख मिलता है।
24 सितंबर को पुलिस द्वारा कुछ युवाओं की गिरफ्तारी की खबर फैलते ही शहर में आक्रोश बढ़ गया। स्कूल-कॉलेजों के छात्र सड़कों पर उतर आए और गिरफ्तार छात्रों की रिहाई की मांग होने लगी।
इसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ा और पुलिस द्वारा आंसू गैस के गोले छोड़े जाने के बाद गोलीबारी की घटना हुई।
गोली लगी और चली गई एक छात्र की जान
इसी गोलीबारी में छात्र राजकिरण दुग्गड़ की मौत का उल्लेख इस ऐतिहासिक विवरण में किया गया है। घटना के बाद प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को लेकर शहर में लंबे समय तक आक्रोश बना रहा।
लेख के अनुसार इस मामले में पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों पर केस दर्ज किए, जिनके कारण कुछ लोगों को वर्षों तक अदालत के चक्कर लगाने पड़े। प्रकरण न्यायालय में चलता रहा और लोग इस दिन को बाद में काला दिवस के रूप में याद करते रहे।
24 सितंबर को आज भी याद किया जाता है
इस आंदोलन से जुड़े राजकिरण दुग्गड़ को श्रद्धांजलि देने के लिए हर साल 24 सितंबर को कार्यक्रम आयोजित किए जाने का उल्लेख मिलता है। उनकी प्रतिमा भी स्थापित किए जाने की बात लेख में कही गई है।
43 साल बाद यह कहानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि चांपा के युवाओं ने दशकों पहले भी शहर की मूलभूत समस्याओं को लेकर अपनी आवाज बुलंद की थी। फर्क सिर्फ दौर का है—तब आंदोलन सड़कों पर था, आज की Gen Z अपनी आवाज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंचाती है।
23-24 सितंबर 1983 की वह घटना आज भी चांपा के इतिहास का एक ऐसा अध्याय है, जिसे शहर शायद ही कभी भूल पाए।
