50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर लिखित सहमति का दावा—थाना प्रभारी चांपा की पदस्थापना के दौरान परिवार को लगातार आर्थिक सहायता देने का उल्लेख
जांजगीर-चांपा। चांपा थाना की कस्टडी में शिव सहिस की मौत के बाद मामला लगातार गरमाता जा रहा है। एक ओर शिव सहिस का परिवार अपने बेटे को खोने के दुख में है, वहीं दूसरी ओर पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली और परिजनों से हुई सहमति को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच 50 रुपये के नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पेपर पर 10 सितंबर 2026 को किया गया लिखित इकरारनामा सामने आया है, जिसने पूरे मामले में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।
सामने आए स्टाम्प पेपर में लिखित रूप से यह इकरार किए जाने का उल्लेख है कि थाना प्रभारी चांपा के पद पर पदस्थापना के दौरान जो भी थाना प्रभारी चांपा के पद पर पदस्थ रहेंगे, उनके द्वारा मृतक शिव सहिस के परिवार को बच्चों की शिक्षा, पोषण एवं पारिवारिक पालन-पोषण के लिए प्रतिमाह 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी।
दस्तावेज में यह भी उल्लेख बताया जा रहा है कि यह सहायता निरंतर दी जाएगी और जीवनभर जारी रहेगी। इतना ही नहीं, इसमें माता-पिता के बाद बच्चों को भी यह सहायता दिए जाने की बात कही गई है। यानी सामने आए इकरारनामे के मुताबिक यह सहायता केवल वर्तमान समय तक सीमित नहीं, बल्कि परिवार की अगली पीढ़ी तक जारी रखने की बात कही गई है।
आखिर हर महीने ₹25 हजार कहां से आएंगे?
यही बात अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल बन गई है। यदि चांपा थाना प्रभारी के पद पर आने वाले प्रत्येक थाना प्रभारी के माध्यम से परिवार को हर महीने ₹25 हजार की राशि दी जानी है, तो सवाल उठता है कि इस भुगतान की वैधानिक और वित्तीय व्यवस्था क्या होगी?
क्या पुलिस विभाग के पास ऐसा कोई निर्धारित फंड या प्रावधान है, जिसके तहत किसी परिवार को जीवनभर प्रतिमाह आर्थिक सहायता दी जा सके? यदि ऐसा कोई प्रावधान मौजूद है तो उसकी प्रक्रिया क्या है और भुगतान की जिम्मेदारी किसकी होगी?
राजेश अग्रवाल ने उठाए गंभीर सवाल

कांग्रेस जिला अध्यक्ष राजेश अग्रवाल ने भी इस पूरे मामले पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि शिव सहिस की मौत के बाद परिवार बेहद दुख और सदमे में है। ऐसे समय में परिवार को राहत देना मानवीय दृष्टि से जरूरी है, लेकिन सरकारी व्यवस्था में किए गए किसी भी वादे की कानूनी और वित्तीय व्यवस्था स्पष्ट होना भी उतना ही जरूरी है।
अग्रवाल ने सवाल किया कि पुलिस के पास ऐसा कौन-सा फंड है, जिससे किसी परिवार को हर महीने 25 हजार रुपये जीवनभर दिए जा सकें? यदि शासन या पुलिस विभाग के नियमों में ऐसी कोई व्यवस्था है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि लोगों को पता चले कि यह राशि किस मद से और किस प्रक्रिया के तहत परिवार को दी जाएगी।
इकरारनामे ने बढ़ाई जिम्मेदारी को लेकर उलझन
स्टाम्प पेपर पर लिखित इकरारनामे में सहायता को थाना प्रभारी चांपा के पद से जोड़कर बताया गया है। ऐसे में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि एक थाना प्रभारी के तबादले या पद से हटने के बाद अगले थाना प्रभारी की इस भुगतान में क्या जिम्मेदारी होगी?
क्या यह राशि किसी सरकारी बजट से जारी होगी या किसी अन्य व्यवस्था के तहत परिवार को भुगतान किया जाएगा? यदि सरकारी बजट से भुगतान होना है तो इसके लिए विभागीय आदेश और बजट प्रावधान क्या है? इन सवालों का जवाब अभी साफ होना बाकी है।
“आज वादा हुआ, कल भुगतान कौन करेगा?”
राजेश अग्रवाल का कहना है कि यदि आज 25 हजार रुपये प्रतिमाह देने का वादा किया गया है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कल इसका भुगतान कौन करेगा और किस मद से करेगा। केवल स्टाम्प पेपर पर लिखित सहमति कर देने से भविष्य की आर्थिक व्यवस्था अपने आप स्पष्ट नहीं हो जाती।
उन्होंने कहा कि यदि इस इकरारनामे को पूरा करने के लिए कोई वैधानिक व्यवस्था नहीं है तो आने वाले समय में शिव सहिस के परिवार को दोबारा सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। इसलिए प्रशासन को अभी से इस वादे की कानूनी स्थिति और भुगतान की पूरी प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए।
परिवार को दोबारा संघर्ष न करना पड़े
शिव सहिस की मौत के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों का आक्रोश पुलिस के खिलाफ सामने आया था। स्थिति को संभालने और परिवार की मांगों पर सहमति बनाने के दौरान यह लिखित इकरारनामा किए जाने की बात सामने आई है।
अब परिवार के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि उस सहायता की स्थायी और सुनिश्चित व्यवस्था का है। यदि ₹25 हजार प्रतिमाह देने की बात तय हुई है और इसे जीवनभर तथा माता-पिता के बाद बच्चों तक जारी रखने का उल्लेख किया गया है, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी और राशि किस सरकारी या वैधानिक मद से उपलब्ध कराई जाएगी।
फिलहाल 50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर 10 सितंबर 2026 को दर्ज यह कथित इकरारनामा शिव सहिस की मौत के मामले में चर्चा का नया केंद्र बन गया है। परिवार को आर्थिक सहारे की उम्मीद है, लेकिन अब लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—हर महीने ₹25 हजार आएंगे कहां से, भुगतान की जिम्मेदारी किसकी होगी और क्या यह वादा कानूनी रूप से लंबे समय तक लागू किया जा सकेगा?
