सरकारी दुकानों में शराब नहीं, आखिर स्टॉक जा कहां रहा है?
छत्तीसगढ़ में शराब व्यवस्था एक बार फिर बड़े विवादों के केंद्र में आ गई है। प्रदेशभर की कई सरकारी शराब दुकानों में इन दिनों देशी और विदेशी शराब के कई लोकप्रिय ब्रांड गायब हैं। ग्राहक सुबह से लाइन में लग रहे हैं, लेकिन दुकानों से जवाब मिल रहा है — “स्टॉक खत्म है।”
हैरानी की बात यह है कि जिन ब्रांडों को सरकारी दुकानों में “आउट ऑफ स्टॉक” बताया जा रहा है, वही शराब कोचियों और अवैध सप्लायरों के पास आसानी से उपलब्ध है, वो भी तय कीमत से कहीं ज्यादा दाम पर। इससे पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े होने लगे हैं कि आखिर सरकारी दुकानों का स्टॉक जा कहां रहा है?
कोचियों का नेटवर्क फिर सक्रिय?
लोगों का आरोप है कि सरकारी दुकानों में जानबूझकर कमी दिखाई जा रही है ताकि बाहर अवैध तरीके से शराब की बिक्री बढ़ सके। कई जगहों पर रात होते ही कोचियों का नेटवर्क सक्रिय दिखाई देता है, जहां मनमाने दामों पर शराब बेची जा रही है।
सरकारी दुकान में जो बोतल नहीं मिल रही, वही बाहर तुरंत उपलब्ध होना इस पूरे खेल को और संदिग्ध बना रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या फिर किसी नए सिंडीकेट की एंट्री हो चुकी है?
प्लास्टिक बोतल का फैसला बना विवाद की जड़
1 अप्रैल से राज्य में कांच की बोतलों की जगह प्लास्टिक बोतलों में शराब बिक्री शुरू की गई। सरकार ने इसे नई व्यवस्था और सुविधा का हिस्सा बताया, लेकिन फैसले के बाद लगातार विवाद सामने आने लगे।
शराब उपभोक्ताओं का कहना है कि प्लास्टिक बोतलों में शराब का स्वाद बदल रहा है। कई लोग शराब पीने के बाद उल्टी, दस्त, पेट दर्द और तबीयत खराब होने जैसी शिकायतें कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग इस व्यवस्था को लेकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक तापमान और लंबे समय तक प्लास्टिक में शराब रखने से गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या बिना पर्याप्त रिसर्च और तैयारी के यह बड़ा फैसला ले लिया गया?
नकली होलोग्राम से बढ़ा शक
मामला तब और गंभीर हो गया जब नकली होलोग्राम की बरामदगी की खबरें सामने आईं। इसके बाद लोगों के मन में यह डर बैठ गया कि कहीं बाजार में नकली या मिलावटी शराब तो नहीं बिक रही।
यदि सरकारी सप्लाई चैन में नकली होलोग्राम पहुंच सकते हैं, तो पूरी व्यवस्था की निगरानी पर बड़ा सवाल खड़ा होना तय है।
आबकारी विभाग भी सवालों में
इधर आबकारी विभाग के भीतर भी हलचल तेज है। आबकारी आयुक्त की छुट्टी, राजस्व लक्ष्य पूरा न होना और लगातार बढ़ती शिकायतों ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।
जानकारों का कहना है कि शराब बिक्री से सरकार को हर साल हजारों करोड़ का राजस्व मिलता है, लेकिन इसके बावजूद दुकानों में स्टॉक की कमी और अव्यवस्था समझ से परे है।
पिछला घोटाला याद दिलाने लगे हालात
छत्तीसगढ़ में पिछली सरकार के दौरान सामने आए हजारों करोड़ के शराब घोटाले को लेकर पूरे देश में चर्चा हुई थी। अब मौजूदा हालात देखकर लोग फिर वही सवाल पूछने लगे हैं — क्या सिस्टम में फिर कोई बड़ा खेल चल रहा है?
सरकारी दुकानों में स्टॉक नहीं, बाहर अवैध बिक्री तेज, प्लास्टिक बोतलों पर विवाद, नकली होलोग्राम और स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें… ये सभी संकेत व्यवस्था में गंभीर गड़बड़ी की तरफ इशारा कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल — जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बिना पूरी तैयारी के कांच की बोतलों को हटाकर प्लास्टिक बोतल लागू करने का फैसला किसने लिया?
यदि इससे लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा है, दुकानों में स्टॉक गायब है और अवैध बिक्री बढ़ रही है, तो इसकी जवाबदेही कौन लेगा?
फिलहाल छत्तीसगढ़ की शराब व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ता नजर आ रहा है और यह मुद्दा आने वाले दिनों में बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद बन सकता है।


