14 सितंबर / अमन छत्तीसगढ़ न्यूज
गणेश उत्सव में डूबा था पूरा शहर, शाम साढ़े पांच बजे आई एक खबर ने मचा दी थी चीख-पुकार… हसदेव पुल पर अहमदाबाद एक्सप्रेस के हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया था
जांजगीर-चांपा। तारीख थी 14 सितंबर 1997। चांपा शहर गणेश उत्सव की खुशियों में डूबा हुआ था। गलियों में उत्सव का माहौल था, लोग भगवान गणेश की आराधना और आयोजन में व्यस्त थे। किसी को अंदाजा तक नहीं था कि कुछ ही देर में यही दिन चांपा की यादों में हमेशा के लिए एक ऐसे दर्द के रूप में दर्ज होने वाला है, जिसे 29 साल बाद भी लोग भूल नहीं पाए हैं।
शाम करीब साढ़े पांच बजे अचानक खबर आई कि अहमदाबाद एक्सप्रेस हसदेव नदी के रेलवे पुल पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। देखते ही देखते चांपा में अफरा-तफरी मच गई। हादसे की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रेन की कई बोगियां बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गईं और कुछ बोगियां पुल से नीचे नदी में जा गिरीं, जबकि कुछ पुल पर ही लटक गईं।
जहां कुछ घंटे पहले तक गणेश उत्सव की रौनक थी, वहीं देखते ही देखते पूरा शहर मदद के लिए घटनास्थल की ओर दौड़ पड़ा।
चीखों से गूंज उठा था हसदेव का पुल
हादसे की तस्वीर आज भी उस दौर के लोगों की आंखों में बसी हुई है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक घटनास्थल पर चारों तरफ अफरा-तफरी थी। घायल यात्रियों की चीख-पुकार, अपनों को खोजते परिजनों की बेचैनी और क्षतिग्रस्त डिब्बों का भयावह दृश्य देखकर लोगों के रोंगटे खड़े हो गए थे।
नगर के साहित्यकार शशिभूषण सोनी ने उस दिन को याद करते हुए बताया कि हसदेव नदी के पुल के ऊपर दो बोगियां लटकी हुई थीं। उनमें फंसे लोगों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी। हालात ऐसे थे कि हर तरफ मदद की जरूरत थी और समय बेहद कम था।
चांपा के लोगों ने बिना देर किए बचाव कार्य शुरू कर दिया।
हादसे की खबर सुनते ही घरों से निकल पड़े लोग
उस दौर में आज जैसी आधुनिक राहत और बचाव सुविधाएं नहीं थीं। ऐसे समय में चांपावासियों ने जो किया, वह आज भी मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
किसी ने घायल यात्रियों को मलबे से बाहर निकाला, किसी ने उन्हें कंधे पर उठाकर अस्पताल पहुंचाया तो किसी ने पानी और भोजन उपलब्ध कराया। कई लोग अपने निजी वाहनों से घायलों को अस्पताल लेकर पहुंचे।
सरस्वती शिशु मंदिर, लायंस स्कूल और बीडीएम चिकित्सालय चांपा सहित अलग-अलग स्थानों पर घायलों के उपचार की व्यवस्था की गई।
शहर के सामाजिक संगठन भी तत्काल सक्रिय हो गए। लायंस क्लब, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चांपा सेवा संस्थान, अक्षर साहित्य परिषद, स्वर्णकार समाज, देवांगन समाज, अग्रवाल समाज और प्रगतिशील स्वर्णकार संघ समेत अनेक संगठनों के लोग मदद में जुट गए।
घर-घर से पहुंचा भोजन, रातभर चला सेवा का सिलसिला
हादसे के बाद चांपा के लोगों ने सिर्फ घटनास्थल पर ही मदद नहीं की, बल्कि अस्पतालों और राहत केंद्रों तक भी अपनी सेवाएं पहुंचाईं।
घायलों और उनके साथ आए लोगों के लिए घर-घर से भोजन जुटाया गया। किसी ने कपड़े दिए, किसी ने दवाइयों का इंतजाम किया और किसी ने अस्पताल पहुंचकर घायलों की देखभाल की।
उस रात शहर के कई लोग अपने घरों में नहीं सोए। महिलाएं भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने अस्पतालों और राहत स्थलों पर पहुंचकर पीड़ितों की सेवा की।
“आंख खुली तो अस्पताल के बेड पर था”
इस दर्दनाक हादसे के प्रत्यक्षदर्शियों में पंडित दयाशंकर पांडेय और राजेश्वर मिश्रा भी शामिल हैं। दोनों उस दिन उसी अहमदाबाद एक्सप्रेस से बिलासपुर से चांपा आ रहे थे।
पंडित दयाशंकर पांडेय के मुताबिक ट्रेन जैसे ही हसदेव नदी के पुल पर पहुंची, अचानक जोरदार आवाज हुई। उन्हें सीने में तेज चोट लगी और वे बेहोश हो गए।
जब आंख खुली तो उन्होंने खुद को अस्पताल के बेड पर पाया।
जिस ट्रेन में कुछ समय पहले तक सफर कर रहे थे, वही ट्रेन कुछ ही पल में मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष का कारण बन चुकी थी।
आज 29 साल बाद भी उस हादसे को याद करते हुए वे भयावह मंजर को नहीं भूल पाते। उनके मुताबिक उस दिन की याद आते ही तन-बदन सिहर उठता है।
रातभर जागती रहीं चांपा की महिलाएं
उस समय की वार्ड पार्षद और सामाजिक कार्यकर्ता शशिप्रभा सोनी ने बताया कि दुर्घटना के बाद नगर की महिलाएं भी सेवा कार्य में जुट गई थीं।
घायलों के प्रति सहानुभूति और उन्हें हर संभव सहायता देने के लिए महिलाएं रातभर लगी रहीं। किसी को भोजन की जरूरत थी तो किसी को पानी की, किसी को दवा चाहिए थी तो किसी को अपने परिवार के बारे में जानकारी।
उस रात चांपा के लोगों ने पीड़ितों को अपना परिवार मानकर उनकी मदद की।
धर्म और समाज की सीमाएं भूलकर एकजुट हुआ था शहर
पंडित रामगोपाल गौरहा, डॉ. सत्यप्रकाश गुप्ता और हरिहर प्रसाद सराफ सहित स्थानीय लोगों ने उस समय के सेवाभाव को याद करते हुए बताया कि हादसे ने लोगों को एकजुट कर दिया था।
लोगों ने जाति, समाज और व्यक्तिगत पहचान से ऊपर उठकर इंसानियत को प्राथमिकता दी।
चांपा के लोगों की यह एकजुटता आज भी उस हादसे की सबसे बड़ी और मानवीय यादों में से एक है।
मृतकों की आत्मा की शांति के लिए भी किए गए अनुष्ठान
हादसे में बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई। आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या 87 बताई गई, हालांकि स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों के बीच उस समय इससे कहीं अधिक लोगों के मारे जाने की चर्चा थी।
हादसे के बाद मृत यात्रियों की आत्मा की शांति के लिए चांपावासियों ने धार्मिक और अनुष्ठानिक कार्य भी किए।
जिन लोगों के परिवारजन घटनास्थल तक नहीं पहुंच पाए थे, उनके लिए भी स्थानीय लोगों ने हर संभव सहायता की।
गणेश उत्सव की खुशियों के बीच छा गया था मातम
चांपा का गणेश उत्सव लंबे समय से अपनी भव्यता और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। लेकिन 14 सितंबर 1997 की घटना ने उत्सव के साथ एक ऐसी दर्दनाक स्मृति जोड़ दी, जिसे शहर आज तक नहीं भूल पाया।
उस दिन गणेश उत्सव की तैयारियों और कार्यक्रमों में व्यस्त लोगों ने कुछ ही घंटों में खुद को एक बड़े मानवीय संकट के बीच खड़ा पाया।
यही वजह है कि हादसे के बाद कई वर्षों तक चांपा में गणेश उत्सव को बेहद सादगी के साथ मनाया गया। उत्सव की खुशियों के बीच उस हादसे में जान गंवाने वालों की याद भी लोगों के मन में बनी रही।
29 साल बाद भी सवाल नहीं, सिर्फ यादें बाकी हैं
आज 14 सितंबर 2026 को उस हादसे को पूरे 29 साल हो चुके हैं। वक्त आगे बढ़ गया। शहर बदल गया। रेलवे की व्यवस्था बदली। नई पीढ़ियां बड़ी हो गईं। लेकिन उस हादसे को अपनी आंखों से देखने वाले लोगों के लिए 14 सितंबर सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।
यह वह दिन है जब उन्होंने मौत को बेहद करीब से देखा था।
यह वह दिन है जब चांपा ने अपनों के साथ-साथ अनजान यात्रियों को भी अपना समझकर उनकी मदद की थी।
और यह वह दिन है जब गणेश उत्सव की खुशियों के बीच पूरा शहर अचानक दर्द, चीखों और मातम में बदल गया था।
हसदेव नदी का वह पुल आज भी खड़ा है, ट्रेनें आज भी वहां से गुजरती हैं, लेकिन 14 सितंबर 1997 की वह भयावह शाम चांपा की सामूहिक स्मृति में आज भी उसी तरह जिंदा है।
29 साल बीत गए, मगर उस हादसे की चीखें आज भी उन लोगों की यादों में गूंजती हैं, जिन्होंने उस दिन मौत का वह मंजर अपनी आंखों से देखा था।
