


आम आदमी पार्टी (AAP) को छत्तीसगढ़ में बड़ा झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता, पूर्व प्रदेश महासचिव (संगठन), पूर्व कोषाध्यक्ष और 2018 एवं 2023 विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी रहे सरदार जसबीर सिंह चावला ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है। उन्होंने न केवल अपने सभी पदों से बल्कि पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से भी त्यागपत्र दिया है।
22 सितंबर 2025 को लिखे गए इस त्यागपत्र में चावला ने पार्टी नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने साफ़ कहा है कि पार्टी अब “आम आदमी” की पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि अवसरवाद और निजी स्वार्थों में उलझकर रह गई है।
14 साल की लंबी यात्रा का अंत
अपने पत्र में चावला ने लिखा है कि वे पिछले 14 सालों से लगातार आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे। साल 2011 में जब आंदोलन से निकली यह पार्टी अस्तित्व में आई, तभी से वे इसमें सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। उन्होंने प्रदेश में संगठन बनाने, चुनाव लड़ने और कार्यकर्ताओं को जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
लेकिन अब उनका कहना है कि पार्टी में ज़मीनी कार्यकर्ताओं के लिए कोई जगह नहीं बची है। उन्होंने लिखा –
“मैं ज़मीन पर आम आदमी पार्टी को काम करते हुए नहीं देख रहा हूँ। पार्टी से दूर होने के मेरे 100 कारण हैं, लेकिन मैं सिर्फ़ 10 ही बता रहा हूँ।”
इस्तीफ़े के प्रमुख कारण (चावला के अनुसार)
संगठन की उपेक्षा – चावला का आरोप है कि पार्टी में अब संगठनात्मक काम नहीं हो रहा। चुनाव सिर्फ़ दिखावे के लिए लड़े जाते हैं और हारने के बाद कोई समीक्षा नहीं की जाती।
पारदर्शिता की कमी – उन्होंने कहा कि पार्टी का आर्थिक लेन-देन साफ़ और पारदर्शी नहीं है। प्रदेश स्तर पर लिए गए चंदे और फंड्स का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा।
स्थानीय नेतृत्व की अनदेखी – प्रदेश नेतृत्व को दरकिनार करके दिल्ली से थोपे गए फैसले होते हैं। स्थानीय नेताओं की राय ली ही नहीं जाती।
चुनावी रणनीति का अभाव – 2023 विधानसभा चुनाव का ज़िक्र करते हुए चावला ने लिखा कि पार्टी के पास कोई ठोस विज़न या गेम प्लान ही नहीं था। नतीजतन, चुनाव नतीजे बेहद निराशाजनक रहे।
वरिष्ठ नेताओं की नियुक्ति में गड़बड़ी – उनका कहना है कि कई बार ऐसे नेताओं को प्रदेश प्रभारी बना दिया गया जो पार्टी की बुनियादी विचारधारा तक नहीं समझते थे।
फंडिंग का विवाद – इस्तीफ़ा पत्र में उन्होंने ज़िक्र किया कि मई 2025 में अमेरिका से आए एक दान (₹5,12,000) का सही इस्तेमाल नहीं हुआ। इसके उपयोग में भी पारदर्शिता की कमी रही।
स्पष्ट विचारधारा का अभाव – चावला ने लिखा कि अब पार्टी की कोई साफ़ “ideology” नहीं रह गई। कभी आदिवासियों के साथ नहीं, कभी अन्य वर्गों के साथ नहीं—AAP अब किसी स्पष्ट विचारधारा पर नहीं खड़ी है।
कांग्रेस से नज़दीकी – उन्होंने पार्टी पर आरोप लगाया कि वह धीरे-धीरे कांग्रेस की “बी-टीम” बनकर रह गई है। राज्य में कांग्रेस की नीतियों का ही परोक्ष समर्थन कर रही है।
आंतरिक गुटबाज़ी – चावला ने कहा कि पार्टी के अंदर गुटबाज़ी और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ ज़्यादा है।
कार्यकर्ताओं की उपेक्षा – उनका कहना है कि मेहनती कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ किया जाता है और बाहर से आए लोगों को अचानक बड़े पद दे दिए जाते हैं।
‘AAP अब जनता की पार्टी नहीं रही’
पत्र में चावला ने लिखा कि आम आदमी पार्टी की स्थापना जनता की समस्याओं को उठाने और साफ-सुथरी राजनीति करने के उद्देश्य से हुई थी। लेकिन आज यह मकसद पीछे छूट चुका है।
“अब पार्टी जनता से दूर और सिर्फ़ व्यक्तिगत फायदे तक सीमित रह गई है। ऐसे में पार्टी में रहकर काम करना मेरे लिए संभव नहीं।”
चावला का राजनीतिक सफर
सरदार जसबीर सिंह चावला छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के शुरुआती नेताओं में रहे।
उन्होंने प्रदेश महासचिव (संगठन), कोषाध्यक्ष जैसे अहम पदों पर काम किया।
2018 और 2023 में वे विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं।
कई बार उन्होंने छत्तीसगढ़ में AAP को मज़बूत करने के लिए आंदोलन और अभियान चलाए।
पार्टी के लिए बड़ा झटका
AAP को छत्तीसगढ़ में मज़बूत करने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे चावला का इस्तीफ़ा पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। विधानसभा चुनावों में पहले ही उम्मीद से कम प्रदर्शन के बाद अब वरिष्ठ नेताओं का इस तरह जाना, संगठन के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।
आगे की राजनीति?
फिलहाल चावला ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे आगे किस दल से जुड़ेंगे। लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि उनका कांग्रेस और अन्य दलों से संपर्क हो सकता है। हालांकि इस पर उन्होंने अभी कोई बयान नहीं दिया।
छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी को यह इस्तीफ़ा केवल संगठनात्मक नुकसान ही नहीं पहुँचाएगा, बल्कि कार्यकर्ताओं का मनोबल भी गिराएगा। सरदार जसबीर सिंह चावला जैसे पुराने और समर्पित नेता का पार्टी छोड़ना इस बात का संकेत है कि AAP अपने मूल रास्ते से भटक गई है।
👉 कुल मिलाकर, चावला का इस्तीफ़ा एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि क्या आम आदमी पार्टी वाकई अपने मूल सिद्धांतों और जनता से जुड़े मुद्दों पर वापस लौट पाएगी, या फिर यह भी अन्य दलों की तरह राजनीति की मुख्यधारा में सिर्फ़ सत्ता की होड़ तक सिमट जाएगी।


